भारत के खिलाफ कैसे एक हुए पाकिस्तान-तुर्की, जानें इमरान-एर्दोगन दोस्ती की इनसाइड स्टोरी

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हाइलाइट्स:

  • भारत के खिलाफ फिर साजिश रच रहे तुर्की और पाकिस्तान
  • हर मामले में एक दूसरे का आंख मूंदकर समर्थन करते हैं इमरान और एर्दोगन
  • भूमध्य सागर विवाद में पाकिस्तान और कश्मीर मामले में तुर्की एक दूसरे के मददगार

अंकारा/ इस्लामाबाद
मुफलिसी में जिंदगी गुजार रहा पाकिस्तान इन दिनों चीन और तुर्की के हथियारों के दम पर खुद को महाशक्तिशाली होने का भ्रम पाल बैठा है। कुछ दिनों पहले ही तुर्की और पाकिस्तान की फौज ने जमीन और समुद्र में एक साथ अतातुर्क XI-2021 नाम से एक सैन्य अभ्यास शुरू किया है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान के गृह राज्य खैबर पख्तूनख्वा में जारी इस सैन्य अभ्यास में दोनों देशों की सेनाएं एक साथ आतंकवाद के खिलाफ तैयारियों को परख रही हैं। तुर्की के पड़ोसी देश ग्रीस की मीडिया में तो ऐसी खबरें आ रही हैं कि ये दोनों देश साथ मिलकर कश्मीर के खिलाफ साजिश भी रच रहे हैं। ऐसे में पाकिस्तान और तुर्की में बढ़ती नजदीकी भारत के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है।

कैसे शुरू हुई तुर्की और पाकिस्तान की दोस्ती
दरअसल, तुर्की और पाकिस्तान दोनों शीत युद्ध के जमाने में अमेरिका के सहयोगी रहे हैं। अमेरिका ने रूस के खिलाफ इन दोनों देशों का सबसे ज्यादा उपयोग किया। यही कारण है कि रूस को न केवल अफगानिस्तान से हार मानकर वापस जाना पड़ा, बल्कि यूरोप और भूमध्य सागर के इलाके में भी अपनी सेना का विस्तार बंद करना पड़ा। तुर्की और पाकिस्तान दोनों ताकत में भी लगभग बराबर हैं। इन दोनों देशों में सबसे बड़ी समानता इनका धर्म इस्लाम है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान और तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगान दोनों ही इस्लामी मुल्कों का नया खलीफा बनने की कोशिश में जुटे हैं।

भारत से दुराव और पाक से नजदीकी की कहानी
1947 के भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद तुर्की का झुकाव पाकिस्तान की ओर ज्यादा हो गया था। इस्लाम के नाम पर उदय हुए पाकिस्तान ने तुर्की के साथ दोस्ती में अपना उज्ज्वल भविष्य देखा। तुर्की में रह रहे कुर्द, अल्बानियाई और अरब जैसे तुर्को के बीच पाकिस्तान की स्वीकार्यता में इस्लाम में बड़ी भूमिका अदा की। मुस्तफा कमाल पाशा की धर्मनिरपेक्ष सोच के बावजूद पाकिस्तान और तुर्की के संबंध धार्मिक आधार पर ही मजबूत हुए। 1970 के दशक में नेकमेटिन एर्बाकन के नेतृत्व में इस्लामी दलों के उदय ने तुर्की की राजनीति में इस्लाम की भूमिका को और मजबूत किया। इस तरह के राजनीतिक अनुभवों ने तुर्की की विदेश नीति को भी प्रभावित किया और पाकिस्तान के साथ तुर्की की नजदीकी का समर्थन किया। साल 1954 में पाकिस्तान और तुर्की ने शाश्वत मित्रता की संधि पर हस्ताक्षर किए।

तुर्की से बड़ी मात्रा में हथियार खरीद रहा पाकिस्तान
तुर्की पाकिस्तान को हथियारों की सप्लाई करने वाले देशों में अभी चौथे स्थान पर है। लेकिन, दोनों देशों के बीच रक्षा संबंध जितनी तेजी से बढ़ रहे हैं, उससे वह दिन दूर नहीं जब पाकिस्तान अपने आधे से अधिक हथियार इसी देश से खरीदेगा। पाकिस्तान वर्तमान में सबसे ज्यादा हथियार अपने सदाबहार दोस्त चीन से खरीदता है। 2018 में तुर्की की सरकारी स्वामित्व वाली डिफेंस कॉन्ट्रैक्टर फर्म ASFAT इंक के साथ पाकिस्तान मिलिट्री ऑफ टेक्नोलॉजी (टीओटी) ने मैग्नम परियोजना के तहत एडा क्लास के चार युद्धपोतों के लिए करार किया था। इसके अलावा पाकिस्तान ने तुर्की के साथ 30 की संख्या में T-129 ATAK हेलिकॉप्टरों की खरीद का सौदा भी किया है।

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आंख बंद कर एक दूसरे का समर्थन करते हैं तुर्की-पाकिस्तान
तुर्की और पाकिस्तान केवल रक्षा संबंधों में ही नहीं, बल्कि कूटनीतिक स्तर पर भी एक दूसरे का आंख बंदकर समर्थन करते हैं। हाल में ही जब ग्रीस के साथ भूमध्य सागर में सीमा विवाद हुआ तो पाकिस्तान ने बिना सच्चाई जाने खुलेआम तुर्की के पक्ष में समर्थन का ऐलान किया था। इतना ही नहीं, भूमध्य सागर में पाकिस्तान और तुर्की की नौसेनाओं ने युद्धाभ्यास कर एकजुटता का ऐलान भी किया। इसके बदले में तुर्की कश्मीर के मामले में पाकिस्तान का खुला समर्थन करता है। तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन तो इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र के मंच पर भी उठा चुके हैं। एर्दोगन ने फरवरी 2020 में कहा कि यह मुद्दा तुर्की के लिए उतना ही महत्वपूर्ण था जितना कि पाकिस्तान के लिए।

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कश्मीर में हिंसा के लिए भाड़े के लड़ाकों को तैनात करेगा तुर्की!
सीरियन ऑब्जर्वेटरी फॉर ह्यूमन राइट्स और हावर न्यूज ने हाल के रिपोर्टों में दावा किया है कि तुर्की सीरिया में सक्रिय अपने भाड़े के लड़ाकों के संगठन सादात को कश्मीर में तैनात करने की प्रक्रिया में है। सादात का नेतृत्व एर्दोगन के सैन्य सलाहकार अदनान तनरिवर्दी करता है। जिसने कश्मीर में बेस तैयार करने के लिए कश्मीर में जन्मे सैयद गुलाम नबी फई नाम के आतंकी को नियुक्त किया है। फई पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के पैसों पर भारत के खिलाफ भाड़े के सैनिकों की भर्ती करने और टैक्स चोरी के लिए अमेरिका की जेल में दो साल की सजा काट चुका है। यह कट्टरपंथी संगठन जमात ए इस्लामी का भी सक्रिय सदस्य है। फई ने अमेरिका में कश्मीर के खिलाफ साजिश रचने के लिए अमेरिकी काउंसिल ऑफ कश्मीर (KAC) की स्थापना की थी। इस संस्था की फंडिग पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई करती है। इस बात की पुष्टि खुद अमेरिका की एफबीआई ने की है।


तुर्की को परमाणु बम बनाने में भी सहायता कर रहा पाकिस्तान!
पाकिस्तान अपने दोस्त तुर्की को परमाणु बम बनाने में भी सहायता कर रहा है। ग्रीस के सैन्य विशेषज्ञों ने इस्लामाबाद और अंकारा की इस बढ़ती नजदीकी का भंडाफोड़ करते हुए दुनिया को चेतावनी भी दी थी। एर्दोगन ने सितंबर 2019 में एक भाषण में कहा था कि कुछ देशों के पास एक दो नहीं बल्कि कई परमाणु मिसाइलें हैं और हमारे पास एक भी नहीं। हम इसे कैसे स्वीकार कर सकते हैं। तुर्की के पास वर्तमान में दो परमाणु रिएक्टर, Tr-1 और Tr-2 हैं, जिसका रखरखाव तुर्की परमाणु ऊर्जा प्राधिकरण करता है। परमाणु बम बनाने के लिए तुर्की के पास समृद्ध यूरेनियम पहले से ही जमा है। ऐसे में तुर्की के पास परमाणु क्षमता विकसित करने के लिए इच्छाशक्ति और कच्चे माल दोनों उपलब्ध है। वह पाकिस्तान की तकनीकी की मदद से खुद के लिए परमाणु बम को तुरंत तैयार कर सकता है।



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