पश्चिम बंगाल में ममता की जीत के मायने क्या है: चुनावी सबक यह कि सांस्कृतिक पहचान वाले राज्यों में ‘दिल्ली की राजनीति’ नहीं चलेगी

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एक घंटा पहलेलेखक: राजदीप सरदेसाई, वरिष्ठ पत्रकार

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ममता ने बंगाल में अगर करीब 48 प्रतिशत वोट हासिल किए हैं तो इसका मतलब साफ है कि हिंदू वोट भी बड़ी संख्या में उनके साथ हैं।

लोकतंत्र में हर चुनाव महत्वपूर्ण होता है लेकिन पश्चिम बंगाल समेत पांच राज्यों के चुनाव परिणामों की गूंज बहुत गहरी है। इन परिणामों से स्पष्ट है कि क्षेत्रीय दल अपने इलाकों में पकड़ बनाए हुए हैं। क्षेत्रीय भाषा, स्थानीय मुद्दों पर लोकल ग्राउंड कनेक्ट या जातीय समूहों की अपेक्षाएं, अपने इलाके की ऐसी नब्ज पर हाथ रखने वाले नेता जनता का दिल जीतने में सफल रहे हैं।

ममता बनर्जी की बड़ी जीत तो इसका प्रमाण है ही। केरल में पिनराई विजयन भी गुड गवर्नेंस के रूप में बेहद मजबूत पकड़ रखते हैं। तमिलनाडु में स्टालिन ने द्रविड पहचान कायम रखी है तो असम में सर्बानंद सोनोवाल और हिमंत बिस्वा सरमा क्षेत्रीय आकांक्षा की पूर्ति करने वाले नेता की छवि बनाए हुए हैं। इन क्षेत्रीय नेताओं की ऐसी ताकत ने उनकी पार्टी को जीत दिलाई है।

इसका सबक ये है कि ऐसे राज्य जिनकी अपनी क्षेत्रीय और सांस्कृतिक पहचान है, वहां आप दिल्ली की राजनीति नहीं कर सकते। इन नतीजों का आकलन करते समय हमें एक बात और ध्यान रखनी चाहिए कि जितनी ताकत और संसाधन भाजपा ने इस बार प. बंगाल चुनाव में लगाए, याद नहीं आता कि किसी विधानसभा चुनाव में खुद भाजपा या किसी अन्य पार्टी ने इतना कुछ झोंका हो। लेकिन राष्ट्रीय पार्टी के अपार संसाधन के आगे क्षेत्रीय नेता अगर अपनी जमीन मजबूत कर अकेले मोर्चा लेता है, तो जनता की सहानुभूति उसके साथ हो जाती है। ममता और विजयन इसके ताजा उदाहरण हैं।

दूसरा फैक्टर मुस्लिम वोट है, जो प. बंगाल के संदर्भ में साफ है कि वहां मुसलमान पूरी तरह तृणमूल के साथ गए हैं। उन्होंने कांग्रेस या वामदलों पर भरोसा नहीं किया। दूसरी ओर, भाजपा ने हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की खूब कोशिश की, श्रीराम के नारे गूंजे और ममता को हिंदू विरोधी घोषित करने का कोई मौका नहीं छोड़ा गया। भाजपा हिंदू-मुस्लिम नैरेटिव में फंसकर रह गई और ममता ने बंगाल की बेटी, बंगाल के गौरव को आगे कर हिंदू ध्रुवीकरण की भाजपाई रणनीति फेल कर दी।

ममता ने बंगाल में अगर करीब 48 प्रतिशत वोट हासिल किए हैं तो इसका मतलब साफ है कि हिंदू वोट भी बड़ी संख्या में उनके साथ हैं। लेकिन विश्लेषण में देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस की दुर्दशा की चर्चा बिना बात अधूरी है। पांच साल पहले जिस बंगाल में कांग्रेस मुख्य विपक्षी पार्टी थी, आज वहां पूरी तरह साफ हो चुकी है। जिस असम और केरल से उसे बड़ी उम्मीद थी, वहां उसके कदम ठहरे हुए दिख रहे हैं। दरअसल, कांग्रेस अब भी अपना मर्ज नहीं समझ पा रही।

राहुल गांधी को समझना पड़ेगा कि ऐन चुनाव के मौके पर सक्रियता से जनता का दिल नहीं जीत सकते। कांग्रेस को जमीनी स्तर पर कार्य करना होगा। कांग्रेस को अस्तित्व बचाना है तो अपने रीजनल लीडर बनाने होंगे। आखिरी और जरूरी बात, महिला वोट। महिलाओं का वोट बैंक धीरे-धीरे बन रहा है।

पश्चिम बंगाल, केरल और कुछ हद तक असम में महिलाओं के लिए राज्य सरकारों द्वारा चलाई गई योजनाओं का फायदा पार्टियों को मिला है। जमीन पर मतदाता देखता है कि उसे क्या फायदा मिला। महिलाओं ने भी ममता, केरल में विजयन और असम में बीजेपी का साथ दिया।

अगले साल 7 राज्यों में चुनाव, जनता कोविड पर भी इन्हें आंकेगी…

अगले साल यूपी, उत्तराखंड, गुजरात और पंजाब समेत सात राज्यों में चुनाव हैं। कोविड से निपटने में इन सरकारों की भूमिका को जनता बहुत गौर से परख रही है। यूपी पर सबकी खास निगाह होगी। देखना होगा कि भाजपा के सामने वहां अखिलेश और मायावती अपनी क्षेत्रीय ताकत के शक्ति समीकरण किस तरह साधते हैं। इस चुनाव का असली संदेश है- ‘अगर चुनाव विधानसभा के लिए हो तो फोकस लोकल मुद्दों, लोकल नेतृत्व पर रखिए।’ बंगाल के नतीजों से राष्ट्रीय राजनीति में बदलाव आएगा, यह कहना इस समय गलत होगा, क्योंकि आम चुनाव के लिए तीन साल अभी बचे हैैं।

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